बाद मेरे दुनिया को समझा लेना


IMG_4506ग़र हो सके तो,
अपनी यादों को समझा लेना.
जो दलीलें दिल को दी,
वो याद, इनको भी करा देना।।

ठीक नहीं इनका हर वक़्त आना,
ठीक नहीं आकर, पलकों को भिंगो जाना.
ग़र हो सके तो,
अपनी यादों को समझा लेना।।

मेरे टूटने के और भी बहाने है,
तुम जिक्र अपना, बचा लेना.

मैं रूठा हूँ जग से,
तुम्हें पाने की हठ में,
जो ना मिली तुम,
बाद मेरे दुनिया को समझा लेना।।

सन्नी कुमार

 

मुझे आजाद कर दो तुम..


Suno Ab Maaf KAr DO

मुझे आजाद कर दो तुम,
मुझे अब माफ़ कर दो तुम,
मै अब भी उलझा हूँ उन्हीं लम्हों में,
जहाँ रिश्तो को  तोड़ गए थे हम.

कहो कुछ भी,
दो चाहे जो सज़ा मंजुर,
मुझे बस माफ़ कर दो तुम,
मुझे आजाद कर दो तुम.

रुलाती है तुम्हारी बातें,
समझ आती है हर उलझन,
की जब बीता है मुझपर भी,
समझ आता है  बीता कल.

सुनो अब माफ़ कर दो तुम,
मुझे आजाद कर दो तुम..

बहुत रोता हूँ, तन्हां हूँ,
तुम्हें खोने को जीता हूँ.
हूँ जिन्दा भी कहाँ अब मैँ,
की अब जो रोज मरता हूँ.

सुनो अब माफ़ कर दो तुम,
मुझे आजाद कर दो तुम..

-सन्नी कुमार

Muhabbat karke jaana hai….!


Love Makes Life Beautiful

Love Makes Life Beautiful

मुहब्बत करके जाना है..!

नदियां निश्छल दीवानी होती है,
जिन्हें सागर से मिलने कि बेचैनी होती है।
फूलों कि ख्वाहिश में भवरें,
मदहोश मदमस्त गाने गाते है।
और क्यूँ चांदनी रात में,
चकोर चंदा से शरमाते है।

मुहब्बत करके जाना है..!

हर सीनें में दिल होता है,
जिनको दिलबर की हसरत होती है।
नजरें लाख छुपाएं,
इनमें सनम का इन्तेजार होता है।
और उठते है वो हाथ दुआओं के लिए,
सीनें में जिनके मुहब्बत होता है।

Muhabbat karke jaana hai….!

Nadiyan, nischhal deewani hoti hai,
Jinhein Saagar se milane ki bechaini hoti hai..
Phulon ki khwahish mein bhanwarein,
madhosh, madmast gaane gate hai..
aur kyun chandni raat mein,
chakor chanda se sharmate hai…

Muhabbat karke jaana hai….!

Har seene mein dil hota hai,
Jinko dilbar ki hasrat hoti hai..
Najrein laakh chhupayein,
Inmein sanam ka intejaar hota hai..
Aur uthate hai wo haath duaaon ke liye,
Seene mein jinke muhabat hota hai..

था तुम्हें मैंने रुलाया!


—   हरिवंशराय बच्चन

 

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर –
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

आज की रात बहुत है..


-मिर्जा गालिब
वो कह के चले इतनी मुलाक़ात बहुत है,
मैंने कहा रुक जाओ अभी रात बहुत है।Aaj ki raat
आंसू मेरे थम जाए तो फिर शौक़ से जाना,
ऐसे में कहा जाओगी बरसात बहुत है।
वो कहने लगी जाना मेरा बहुत जरूरी है,
नहीं चाहती दिल तोडूं तेरा पर मज़बूरी है।
गर हुयी हो कोई खता तो माफ़ कर देना,
मैंने कहा हो जाओ चुप इतनी कही बात बहुत है।
समझ गया हूँ सब और कुछ कहो जरूरी नहीं,
बस आज की रात रुक जाओ, जाना इतना भी जरूरी नहीं।
फिर कभी न आऊंगा तुम्हारी जिंदगी में लौट के,
साड़ी जिंदगी तनहायीं के लिए, आज की रात बहुत है।

जीवन की आपाधापी में


—   हरिवंशराय बच्चन

Harivansh-Rai-Bachchanजीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा –
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई


– गुलजार

दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई

आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई

फिर नजर में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुघालता है कोई

देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ।