Happy Valentine Day


You are lucky if you don’t need words to say your feelings. Let me be honest and tell you all that today i wished my both love, My wife and My Ex.. To wish my wife i don’t need any words, even she doesn’t believe in this materialistic   /cosmetic day but on other side i had to type a lot to wish my Ex…
On this day, which is believed to be lover’s day may you all find your soul mate with whom you can make your Life Amazing.
Love to All.
Sunny Kumar

खरौना में शिक्षा का माहौल


जैसा की आप सब को पता है की पिछले सप्ताह पंचायत भवन के प्रांगण में गाँव में शिक्षा के माहौल विषय पर चर्चा हुयी थी जिसमे छात्रों ने अपने विचार रखे थे, आज इस पोस्ट से उन्ही विचारों को साझा कर रहा हूँ, कमेंट बॉक्स में आप सब भी अपने विचार रख सकते है..

कक्षा दस के दीपक कुमार कहते है कि गाँव में शिक्षा का माहौल औसत है और कई चीजें है जिन्हें सुधारा जा सकता है. दीपक कहते है कि शिक्षा पे कहीं सामूहिक चर्चा नही होती, गाँव में पुस्तकालय है पर सालो से बंद है और जब खुलता है तो बारात घर के रूप में अब समय है की छात्रों के लिए पुस्तकालय के ताले खोल दिए जाए.
वही ग्रेजुएशन की पढाई कर रही अन्नू कुमारी का कहना है की गाँव शहर के समीप है और यही वजह है की यहाँ शिक्षा का माहौल अच्छा है, सक्षम लोगों के पास गाँव के अन्दर और बाहर कई विकल्प है पर गरीबों के लिए भी अब शिक्षा पहले जितना मुश्किल नहीं है, सरकार ने शिक्षा पे जोड़ दिया है जिसका फायदा विद्यार्थियों को मिलता है.
सातवीं कक्षा में पढ़ रहे आदित्य कुमार कहते है की गाँव में शिक्षा का माहौल बहुत अच्छा है, यहाँ ३ मिडिल और १ हाई स्कूल है जहाँ अच्छी पढाई होती है और वह आगे पढ़ लिख कर डॉक्टर बनाना चाहते है.
वही आशा कुमारी, पुतुल कुमारी गाँव ने गाँव में शिक्षा के माहौल को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और अच्छा बताया.
रवीना खातून कहती है की गाँव में शिक्षा का माहौल अच्छा है और विद्यालय के शिक्षक भी अच्छे है, उसे ख़ुशी है की वह खरौना में रहती है.
नवम वर्ग के छात्र नितेश कुमार कहते है की गाँव में शिक्षा के लिए अनुकूल माहौल है, हाई स्कूल में अच्छी पढ़ाई होती है और गाँव में कई कोचिंग सेंटर भी है जिससे छात्रो को शिक्षा के लिए शहर जाने की आवश्यकता भी नहीं होती.
ग्रेजुएशन के छात्र रवि कुमार कहते है की गाँव में सामाजिक स्टार पर शिक्षा का माहौल सहयोगात्मक नहीं है और वो चाहते है की पढ़ लिख कर एक अच्छा माहौल बनाएं जहाँ शिक्षा पर सामूहिक चर्चा हो, और इसी उद्देश्य से पंचायत भवन या पुस्तकालय का उपयोग कर एक माहौल बनाने की कोशिश करेंगे.
नवम के छात्र सिद्धार्थ कुमार कहते है की शिक्षा का माहौल औसत है किन्तु आज भी समाज में बहुत से ऐसे परिवार है जहाँ शिक्षा को महत्त्व नही दिया जा रहा, माता-पिता शिक्षा को नजरंदाज करते हुए बच्चों को जल्दी काम पर लगा देते है, बेटियों की शादी आज भी कम उम्र में कर दी जाती है जो गलत है. शिक्षा समय की समय की मांग है और सबको शिक्षा को महत्त्व देना चाहिए.
सुमित कुमार उर्फ़ चीकू कहते है की गाँव में शिक्षा का माहौल सकारात्मक नहीं है, शिक्षा सामाजिक चर्चा का विषय नहीं है, लोग आपकी १०० बुराई करेंगे पर १ हल नहीं बताएँगे. गाँव में ३ मिडिल १ हाई स्कूल है पर वह गाँव के स्कूल के माहौल से अवगत नहीं है चुकी उनकी पढ़ाई गाँव से बाहर हो रही है. सुमित कहते है की सामाजिक स्तर पे एक सकारात्मक माहौल बनें तो बात बने.
मयंक पराशर के अनुसार गाँव में शिक्षा का माहौल अच्छा है और यहाँ दसवी तक के छात्र के लिए सारी सुविधाएं है. गाँव में कई डॉक्टर, इंजिनियर, शिक्षक है. गाँव में निरक्षरों की संख्या कम है पर गाँव में ऐसे बहुत से लोग है जो बच्चों को स्कूल भेजने के बदले काम पर लगा देते है, कई लोग जब स्कूल से पैसा मिलने वाला होता है तभी बच्चे पर ध्यान देते है की स्कूल जा रहा है की नहीं और बाद में फिर उन्हें बच्चो के शिक्षा की फिकर नहीं होती.
ग्रेजुएशन, अकाउंट की छात्रा सोनम कुमारी कहती है की गाँव में शिक्षा का माहौल सामान्य है, गाँव में कई सरकारी विद्यालय है और १०वीं तक की पढ़ाई गाँव में ही संभव है किन्तु यहाँ पढ़ाई उतना अच्छा नही है, मिडिल स्कूल की प्राध्यापिका की शिकायत करती वो कहती है की स्कूल में भोजन तो मिलता है पर अच्छी शिक्षा नहीं और यही कारण है की बच्चे टिफिन बाद अक्सर स्कूल से भाग जाते है. गाँव में नयी कोशिश करने वालों के लिए नकारात्मक माहौल है और सृजनात्मक कोशिशों को ठुकराना दुर्भाग्य है. वह पढ़-लिख कर बैंक में नौकरी पाना चाहती है और अपने माता पिता और गाँव का नाम रौशन करना चाहती है.
ग्रेजुएशन के ही छात्र सुशांत कुमार गाँव में शिक्षा के माहौल पर कहते है की गाँव में शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन है, नवोदय विद्यालय, हाई स्कूल, कईप्राथमिक और मध्य विद्यालय के अलावा गाँव में पुस्तकालय भी है जो बहुत कम गाँव में होता है बाबजूद इसके गाँव में इन संसाधनों का उपयोग बेहतर तरीके से नही हो पा रहा.विद्यालय के शिक्षको को बस वेतन से मतलब होता है, और आज छात्र अपने शिक्षको की उतनी इज्जत भी नही करते, जो गलत है. वो हाल ही में पिट गये हेडमास्टर की भी चर्चा करते है और टिफिन में बच्चों के भागने के लिए शिक्षा को बोझिल होना मानते है. सुशांत कहते है की शिक्षकों को चाहिए की छात्रो को शिक्षा के लिए उत्साहित करें, भोजन तो मिल ही रहा है, अच्छी शिक्षा भी मिले तो बात बनें. सुशांत आगे कहते अहि की गाँव में कोशिश करने वालों को नकारा जाता है जो गलत है, जो समाज को कुछ देना चाहते है उनको रोका जाता है, पुस्तकालय का उद्देश्य भी ख़तम है और हम सबको इस माहौल को बेहतर बनाना चाहिए, और हम सब कोशिश भी कर रहे है. इन सभी मित्रो का आभार जो हमारे साहत है….खरौना बदल रहा है ;) :)

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नहाय खाय के सा‍थ छठ व्रत आज से शुरू


Beautiful and Spiritual Chhath ghat, Major festival of Kharauna

Beautiful and Spiritual Chhath ghat, Major festival of Kharauna.

नहाय-खाय के साथ आज से छठ शुरू हो गया। खरौना में  में दीपावली के बाद से ही छठ पर्व के गीत ‘महिमा बा राऊर अपार हे छठी मईया.., उ जे कांचही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाये.., छठी मइया आइ दुअरिया.., कोपी-कोपी बोलले सूरज देव.., हाजीपुर के केलवा महंग भइले.., मोरा भईया जाइला.., उगी-उगी सूरज देव.., डारी-डारी चहके सुगवा..’ की स्वर लहरियां सुनाई दे रही हैं। शारदा सि्हा, देवी, अुराधा पौडवाल, कल्पा, अजीत कुमार अकेला, सजो बधेला व सी के गाये छठी मइया के गीत वातावरण में गुंजायमान हैं।

छठ पूजा में नियमों का साफ़-सफाई का होता है विशेष 

गाँव के तमाम छठ पोखरों में आज से साफ़-सफाई का भी कार्य शुरू हो गया है. आपको मालूम ही होगा की छठ पर्व में नियमों का बड़ा ध्यान रखा जाता है और साफ़ सफाई को विशेष महत्त्व मिलता है. पर्व से पूर्व ही घर की साफ-सफाई, व्रतियों के लिए अलग से कमरा, अलग बिछाव, अलग बर्त का इंतजाम किया गया है। व्रतियों के कमरे में जूते-चप्पल पहनकर जाना सख्त मना है। आस्था का महापर्व छठ सोमवार को नहाय-खाय के साथ शुरू हो जाएगा। चार दिवसीय अनु ष्‍ठान के दूसरे दिन मंगलवार को छठव्रती खरना करेंगे। बुधवार को अस्ताचलगामी भगवान सूर्य को अर्घ्‍य दिया जाएगा। गुरुवार की सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्‍य अर्पित करे के साथ महापर्व संपन्‍न जाएगा।

साक्षात् देव हैं भगवान भास्कर

छठ महापर्व पर भगवा भास्कर की पूजा होती है। वे साक्षात् देव हैं, जो लोगों को सीधे दिखाई देते हैं। सूर्य की पूजा आदि काल से की जा रही है। आचार्य पण्डित विनोद झा वैदिक का कहा है कि सूर्य की पूजा का उल्लेख द्वापर काल से मिलता है। तभी से सूर्य पूजा की परंपरा चली आ रही है। देश व दुनिया में सूर्य की पूजा विभिन्‍न रूपों में की जाती है।

छठ महापर्व के बारे में और यहाँ पढ़े..

UN Secretary-General MESSAGE ON INTERNATIONAL WOMEN’S DAY


THE SECRETARY-GENERAL’S MESSAGE ON INTERNATIONAL WOMEN’S DAY, 8 MARCH 2013

As we commemorate International Women’s Day, we must look back on a year of shocking crimes of violence against women and girls and ask ourselves how to usher in a better future.

One young woman was gang-raped to death. Another committed suicide out of a sense of shame that should have attached to the perpetrators. Young teens were shot at close range for daring to seek an education.

These atrocities, which rightly sparked global outrage, were part of a much larger problem that pervades virtually every society and every realm of life.

Look around at the women you are with. Think of those you cherish in your families and your communities. And understand that there is a statistical likelihood that many of them have suffered violence in their lifetime. Even more have comforted a sister or friend, sharing their grief and anger following an attack.

This year on International Women’s Day, we convert our outrage into action. We declare that we will prosecute crimes against women – and never allow women to be subjected to punishments for the abuses they have suffered. We renew our pledge to combat this global health menace wherever it may lurk – in homes and businesses, in war zones and placid countries, and in the minds of people who allow violence to continue.

We also make a special promise to women in conflict situations, where sexual violence too often becomes a tool of war aimed at humiliating the enemy by destroying their dignity.

To those women we say: the United Nations stands with you. As Secretary-General, I insist that the welfare of all victims of sexual violence in conflict must be at the forefront of our activities. And I instruct my senior advisers to make our response to sexual violence a priority in all of our peace-making, peacekeeping and peace building activities.

The United Nations system is advancing our UNiTE to End Violence against Women campaign, which is based on the simple but powerful premise that all women and girls have a fundamental human right to live free of violence.

This week in New York, at the Commission on the Status of Women, the world is holding the largest-ever UN assembly on ending violence against women. We will make the most of this gathering – and we keep pressing for progress long after it concludes.

I welcome the many governments, groups and individuals who have contributed to this campaign. I urge everyone to join our effort. Whether you lend your funds to a cause or your voice to an outcry, you can be part of our global push to end this injustice and provide women and girls with the security, safety and freedom they deserve.

सरस्वती पूजा आज, उत्साह में डूबा गाँव


Basant-Panchami-Kharaunaखरौना, बासंती नवरात्र की पंचमी तिथि आज (शुक्रवार) को है। इस अवसर पर मां सरस्वती की पूजा को लेकर गाँव  उत्साहित है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी गाँव में सरस्वती पूजा को लेकर लोगों, खासकर विद्यार्थियों के बिच काफी उत्साह है, बताते चले की गाँव में लगभग हर मोहल्ले में साथ ही समस्त विद्यालयों में माता सरस्वती जी का विदिहिवत पूजा किया जाता है। शक्ति स्थल, नवोदय विद्यालय, शीतल उच्च विद्यालय, मध्य विद्यालय खरौना टाँड,मध्य विद्यालय खरौना  डीह, के साथ साथ लगभग सारे ब्रह्म  स्थानों पे सार्वजानिक पूजा का आयोजन किया जाता है, बसंत पंचमी के स्वागत में आज पूरा गाँव हर्ष में डूबा रहेगा और विद्या की माता सरस्वती की पूजा प्रत्येक घर में होगी।

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मूर्ति विग्रह का संदेश
मां सरस्वती श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और हंस वाहन है। इसका मतलब है कि लोगों का जीवन स्वच्छ व चरित्रवान होना चाहिए। हमारा ज्ञान निर्मल हो, विकृत नहीं। हाथ में पुस्तक का मतलब मनुष्य को अध्ययनशील होना चाहिए। उनके हाथ में माला से चिंतन करते रहने का संदेश है। हंस वाहन होने से मनुष्य में नीर क्षीर विवेक का गुण होना चाहिए। नदी किनारे बैठने का मतलब विद्यार्थियों को एकांत में रहकर विद्या अध्ययन करना चाहिए। तस्वीर में उगते सूर्य का होना। अध्ययन के लिए प्रात: का समय ही उपयुक्त है। वीणा से आशय संगीत साधना ही नहीं बल्कि संपूर्ण सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रियता होनी चाहिए। हाथ में किताब पुस्तकों के प्रति लगाव का द्योतक है।
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बसंत पंचमी क्यों
बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की पूजा अर्चना को लेकर अनेक धार्मिक किवदंतियां हैं। कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की रचना करने के बाद देखा तो उसमें कुछ कमी नजर आई। इस कमी को पूरा एक चतुर्भुजी स्त्री की रचना से की। ब्रह्मा जी ने उनके हाथों में रखी वीणा बजाने का अनुरोध किया। वीणा बजाते ही मधुर नाद से संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जड़ चेतन हो गया। तब उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा।

President Pranab Mukherjee’s speech on the eve of Republic Day


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My Fellow Citizens:

On the eve of our 64th Republic Day, I extend warm greetings to all of you in India and abroad. I convey my special greetings to members of our armed forces, paramilitary forces and internal security forces.

India has changed more in last six decades than in six previous centuries. This is neither accidental nor providential; history shifts its pace when touched by vision. The great dream of raising a new India from the ashes of colonialism reached a historic denouement in 1947; more important, independence became a turning point for an equally dramatic narrative, nation-building. The foundations were laid through our Constitution, adopted on 26 January 1950, which we celebrate each year as Republic Day. Its driving principle was a compact between state and citizen, a powerful public-private partnership nourished by justice, liberty and equality.

India did not win freedom from the British in order to deny freedom to Indians. The Constitution represented a second liberation, this time from the stranglehold of traditional inequity in gender, caste, community, along with other fetters that had chained us for too long.

This inspired a Cultural Evolution which put Indian society on the track to modernity: society changed in a gradual evolution, for violent revolution is not the Indian way. Change across the knotted weaves of the social fabric remains a work in progress, impelled by periodic reform in law and the momentum of popular will.

In the last six decades there is much that we can be proud of. Our economic growth rate has more than tripled. The literacy rate has increased by over four times. After having attained self sufficiency, now we are net exporters of food-grain. Significant reduction in the incidence of poverty has been achieved. Among our other major achievements is the drive towards gender equality.

No one suggested this would be easy. The difficulties that accompanied the first quantum leap, the Hindu code bill, enacted in 1955 tell their own story. It needed the unflinching commitment of leaders like Jawaharlal Nehru and Babasaheb Ambedkar to push through this remarkable legislation. Jawaharlal Nehru would later describe this as perhaps the most important achievement of his life.

The time has now come to ensure gender equality for every Indian woman. We can neither evade nor abandon this national commitment, for the price of neglect will be high. Vested interests do not surrender easily. The civil society and the government must work together to fulfill this national goal.

Fellow Citizens:

I speak to you when a grave tragedy has shattered complacency. The brutal rape and murder of a young woman, a woman who was symbol of all that new India strives to be, has left our hearts empty and our minds in turmoil. We lost more than a valuable life; we lost a dream.

If today young Indians feel outraged, can we blame our youth?

There is a law of the land. But there is also a higher law. The sanctity of a woman is a directive principle of that larger edifice called Indian civilization. The Vedas say that there is more than one kind of mother: birth mother, a guru’s wife, a king’s wife, a priest’s wife, she who nurses us, and our motherland. Mother is our protection from evil and oppression, our symbol of life and prosperity. When we brutalise a woman, we wound the soul of our civilization.

It is time for the nation to reset its moral compass. Nothing should be allowed to spur cynicism, as cynicism is blind to morality. We must look deep into our conscience and find out where we have faltered. The solutions to problems have to be found through discussion and conciliation of views. People must believe that governance is an instrument for good and for that, we must ensure good governance.

Fellow Citizens:

We are on the cusp of another generational change; the youth of India spread across villages and towns, are in the vanguard of change. The future belongs to them. They are today troubled by a range of existential doubts. Does the system offer due reward for merit? Have the powerful lost their Dharma in pursuit of greed? Has corruption overtaken morality in public life? Does our legislature reflect emerging India or does it need radical reforms?

These doubts have to be set at rest. Elected representatives must win back the confidence of the people. The anxiety and restlessness of youth has to be channelized towards change with speed, dignity and order.

The young cannot dream on an empty stomach. They must have jobs capable of serving their own as well as the nation’s ambitions. It is true that we have come a long way from 1947, when our first Budget had a revenue of just over Rs.171 crore. The resource base of the Union government today is an ocean compared to that drop. But we must ensure that the fruits of economic growth do not become the monopoly of the privileged at the peak of a pyramid. The primary purpose of wealth creation must be to drive out the evil of hunger, deprivation and marginal subsistence from the base of our expanding population.

Fellow Citizens:

Last year has been a testing time for us all. As we move ahead on the path of economic reforms, we must remain alive to the persisting problems of market-dependent economies. Many rich nations are now trapped by a culture of entitlement without social obligations; we must avoid this trap. The results of our policies should be seen in our villages, farms and factories, schools and hospitals.

Figures mean nothing to those who do not benefit from them. We must act immediately, otherwise the current pockets of conflict, often described as “Naxalite” violence, could acquire far more dangerous dimensions.

Fellow Citizens:

In the recent past, we have seen serious atrocities on the Line of Control on our troops. Neighbours may have disagreements; tension can be a subtext of frontiers. But sponsorship of terrorism through non-state actors is a matter of deep concern to the entire nation. We believe in peace on the border and are always ready to offer a hand in the hope of friendship. But this hand should not be taken for granted.

Fellow Citizens:

India’s most impregnable asset is self-belief. Each challenge becomes an opportunity to strengthen our resolve to achieve unprecedented economic growth and social stability. Such resolve must be nourished by an avalanche of investment, particularly in better and greater education. Education is the ladder that can help those at the bottom to rise to the pinnacles of professional and social status. Education is the mantra that can transform our economic fortunes and eliminate the gaps that have made our society unequal. So far education has not reached, to the extent desired, to those most in need of this ladder. India can
double its growth rate by turning today’s disadvantaged into multiple engines of economic development.

On our 64th Republic Day, there may be some reason for concern, but none for despair. If India has changed more in six decades than six previous centuries, then I promise you that it will change more in the next ten years than in the previous sixty. India’s enduring vitality is at work.

Even the British sensed that they were leaving a land which was very different from the one they had occupied. At the base of the Jaipur Column in Rashtrapati Bhavan there is an inscription:

“In thought faith…

In word wisdom…

In deed courage…

In life service…

So may India be great”

The spirit of India is written in stone.

JAI HIND!

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