Muhabbat karke jaana hai….!


Love Makes Life Beautiful

Love Makes Life Beautiful

मुहब्बत करके जाना है..!

नदियां निश्छल दीवानी होती है,
जिन्हें सागर से मिलने कि बेचैनी होती है।
फूलों कि ख्वाहिश में भवरें,
मदहोश मदमस्त गाने गाते है।
और क्यूँ चांदनी रात में,
चकोर चंदा से शरमाते है।

मुहब्बत करके जाना है..!

हर सीनें में दिल होता है,
जिनको दिलबर की हसरत होती है।
नजरें लाख छुपाएं,
इनमें सनम का इन्तेजार होता है।
और उठते है वो हाथ दुआओं के लिए,
सीनें में जिनके मुहब्बत होता है।

Muhabbat karke jaana hai….!

Nadiyan, nischhal deewani hoti hai,
Jinhein Saagar se milane ki bechaini hoti hai..
Phulon ki khwahish mein bhanwarein,
madhosh, madmast gaane gate hai..
aur kyun chandni raat mein,
chakor chanda se sharmate hai…

Muhabbat karke jaana hai….!

Har seene mein dil hota hai,
Jinko dilbar ki hasrat hoti hai..
Najrein laakh chhupayein,
Inmein sanam ka intejaar hota hai..
Aur uthate hai wo haath duaaon ke liye,
Seene mein jinke muhabat hota hai..

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Kaash, Ye Aanshoon Tham Jaaye..!


Kaash Ye Aansoo Tham Jaaye

Kaash Ye Aansoo Tham Jaaye

आँखों में आज जो पानी है,
आँखों में जमी ही रह जाए।
दिखती दुनिया इनसे धुंधली है,
और यही मेरी सच्चाई है।

रोका ना जाता इनको अब,
दिल में जो मचा बवंडर है।
बह निकले जो फिर रुके नहीं,
पीर बनी समन्दर है।

हो झूठ सही पर सपने है,
जो दिल ने सजाये उससे है।
कहीं ये गीला न हो जाए,
कि काश ये आँसू थम जाए।

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Ankhon mein aaj jo paani hai,
aankon mein jami hi rah jaaye.
deekhati duniya inase dhundhali hai,
aur yahi meri sacchai hai..

Roka na jaata inko ab,
dil mein jo machaa bawandar hai,
bah nikle jo fir ruke nahin,
Peer bani samandar hai..

Ho jhuth sahi par sapne hai,
Jo dil ne sajaaye usase hai.
kahin ye geela n ho jaaye,
ki kaash ye aansu tham jaaye..

क्यूंकि बहरी, भ्रष्ट है सरकार, अब सरकार ये बदल दो..


मिला मौका है इस बार, कि इतिहास अब बदल दो.
न करनी परे फिर से शिकायत, ये हालत अब बदल दो..
मिली आजादी विरासत में हमें, इसे स्वराज में अब बदल दो,
क्यूंकि बहरी, भ्रष्ट है सरकार, अब सरकार ये बदल दो..

अपने नहीं ये हमारे,
ना इनको देश का ही है ख्याल..
ये तो तुर्कों से है लुटेरे,
बुनते हर घडी लूट की चाल..

जनमानस की छोड़ ही दो आप,
इनको माँ भारती का भी ख्याल नहीं..
पकरे गए खरबों की चोरी में,
फिर भी आँखों में है इनके शर्म नहीं..

बख्शी थोड़ी इज्जत है,
जो कह दीया हमने सरकार,
जो दिल से पूछो तो कहूँ,
है यही असली गद्दार..

कभी हमें रंगों में बाँटते,
कभी दीन, दिशा के नाम पर,
देश का दुर्दशा कर दिया,
वोट पाते गाँधी के नाम पर..

इनको नहीं दीखते सपने स्वराज के,
इनको नहीं करनी अब चर्चा, लोकपाल की.
ये तो गूंगे, बहरे लोग है,
क्यूँ इनसे उम्मीदें बेकार की..

यही समय है सोच लो अब आप,
किसको जीते हो,
दिल से हो हिंदुस्तानी,
या अधिकार बस वोटों का रखते हो..

है जमीर जागा हुआ,
या आप भी उनसे हो,
जो नहीं तो फिर क्यूँ,
आप विज्ञापनों पे मरते हो?

आँखे खोलो देखों,
किस हाल में माँ भारती,
जो कर सके सुपरिवर्तन,
अब उसी का साथ दो..

है मुझें उम्मीद खुद से,
ऐतबार आप पे करता हूँ..
इसीलिए अपनी मन की बात,
आप तक सीधे रखता हूँ..

मिला मौका है इस बार, कि इतिहास अब बदल दो.
न करनी परे फिर से शिकायत, ये हालत अब बदल दो..
मिली आजादी विरासत में हमें, इसे स्वराज में अब बदल दो,
क्यूंकि बहरी, भ्रष्ट है सरकार, अब सरकार ये बदल दो..

था तुम्हें मैंने रुलाया!


—   हरिवंशराय बच्चन

 

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर –
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

पथ की पहचान


—   हरिवंशराय बच्चन

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

पुस्तकों में है नहीं
छापी गई इसकी कहानी
हाल इसका ज्ञात होता
है न औरों की जबानी

अनगिनत राही गए
इस राह से उनका पता क्या
पर गए कुछ लोग इस पर
छोड़ पैरों की निशानी

यह निशानी मूक होकर
भी बहुत कुछ बोलती है
खोल इसका अर्थ पंथी
पंथ का अनुमान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

यह बुरा है या कि अच्छा
व्यर्थ दिन इस पर बिताना
अब असंभव छोड़ यह पथ
दूसरे पर पग बढ़ाना

तू इसे अच्छा समझ
यात्रा सरल इससे बनेगी
सोच मत केवल तुझे ही
यह पड़ा मन में बिठाना

हर सफल पंथी यही
विश्वास ले इस पर बढ़ा है
तू इसी पर आज अपने
चित्त का अवधान कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

है अनिश्चित किस जगह पर
सरित गिरि गह्वर मिलेंगे
है अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे

किस जगह यात्रा खतम हो
जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे

कौन सहसा छू जाएँगे
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।

पूर्व चलने के बटोही बाट की पहचान कर ले।

तुम बढ़ के वीर, उसे गले लगाओ..


मौसम माशूक़ सा प्यारा हो,
या तेज सूरज झुलसाने आया हो..
आज भीनी हवा स्फूर्ति बढ़ाती हो,
या कठोर ठण्ड डराने आया हो..
कर्मपथ के वीरों तुम रुकना मत,
चाहे रोकने आया आज सारा ज़माना हो..

हे, इस सामान्य पथ के असामान्य पथिकों,
तुम कर्मठ सबमें विशेष हो..
जो भी तय की है,  मंजिल तुमने,
मानो उन्हीं को पूरा करने आये हो..

मत सोचो कभी ये,  है मंजिल दूर,
जानो, वो तो राह में तेरे बैठी है,
आएगा उसका चहेता, अगले ही क्षण,
ऐसे अरमान सजाये बैठी है..

तुम हो पथिक अपना धर्म निभाओ,
बस मंजिल को बढ़ते जाओ..
देखो वो भी दे रही है आवाज़,
की इन मोड़ों से तुम मत घबराओ..
अगले क्षण में मिलने को वो आतुर,
तुम बढ़ के वीर, उसे गले लगाओ..

– सन्नी कुमार

कृष्ण की चेतावनी


कृष्ण की चेतावनी (रश्मिरथी)Rashtrakavi Dinkar
– रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

‘दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका,
उलटे हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।

भाई पर भाई टूटेंगे, विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।’

थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,
दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!