उस दर से मेरी सदा ही दुरी रखना


 

Ek Duaa

Ek Duaa

उस दर से मेरी सदा ही दुरी रखना,
गुज़रकर जहाँ से लोगों के ईमान बदलते हो..

दब जाती हो चींख जहाँ सिक्कों की खनक में,
भूल जाते हो जाके खुद के वजूद को,
उस तेज से हमको महरूम ही रखना,
देख जिसको एक बार और कुछ दीखता नहीं हो..

 

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Us dar se meri sadaa hi duri rakhna,
guzarkar jahan se logon ke eeman badalte ho..
dab jaati ho cheekh jahan sikkon ki khanak mein,
bhul jaate ho jaake khud ke wajood ko,
us tej se humko mahroom hi rakhna,
dekh jisko ek baar aur kuchh dikhta nahin ho..

है समय से ये आजाद..


I don’t drink but i love to sit with my cousins, friends and colleagues when they get booze. I have experienced a lot of fun and came to know more and more about them, i must say a real self came out once people get drink.

This post is dedicated to all my friends, who have given me chance to sit with them and enjoy their oscar winning performances ;)

बड़ी सीधी है बातें इनकी ,
नवाबों सा है अंदाज.
आँखों में छाये मस्ती,
है समय से ये आजाद..

नाम उनका तब बताएं,
जब हो कोई वो ख़ास.
ये मगरूर दीवाना है,
होता हर किसी के आस-पास..

न उम्र इनकी पूछो तुम.
ये जवां हुआ फिर आज.
है गम-ए-मुहब्बत सीने में इनके ,
फिर भी मुस्कुरा कर, करते समय पर राज़.

टूट जाए जो डोर पतंगों के,
और फिर जो हो जाये आजाद,
कुछ तबियत इनकी भी ऐसी ही है,
ये भी झूमते, उड़ते, गिरते उसी अंदाज..

दिन में दीन मिलते है,
ये तो रातों के सौदागर है.
पता बस झीलों का होता है,
पानी तो सर्व व्यापक है..

था तुम्हें मैंने रुलाया!


—   हरिवंशराय बच्चन

 

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर –
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

आज की रात बहुत है..


-मिर्जा गालिब
वो कह के चले इतनी मुलाक़ात बहुत है,
मैंने कहा रुक जाओ अभी रात बहुत है।Aaj ki raat
आंसू मेरे थम जाए तो फिर शौक़ से जाना,
ऐसे में कहा जाओगी बरसात बहुत है।
वो कहने लगी जाना मेरा बहुत जरूरी है,
नहीं चाहती दिल तोडूं तेरा पर मज़बूरी है।
गर हुयी हो कोई खता तो माफ़ कर देना,
मैंने कहा हो जाओ चुप इतनी कही बात बहुत है।
समझ गया हूँ सब और कुछ कहो जरूरी नहीं,
बस आज की रात रुक जाओ, जाना इतना भी जरूरी नहीं।
फिर कभी न आऊंगा तुम्हारी जिंदगी में लौट के,
साड़ी जिंदगी तनहायीं के लिए, आज की रात बहुत है।

जीवन की आपाधापी में


—   हरिवंशराय बच्चन

Harivansh-Rai-Bachchanजीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भूला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-सा
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा –
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

कृष्ण की चेतावनी


कृष्ण की चेतावनी (रश्मिरथी)Rashtrakavi Dinkar
– रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

‘दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका,
उलटे हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।

भाई पर भाई टूटेंगे, विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।’

थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,
दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!

वो गुजरे ळम्हे मिल जाती है..


aloneतुम्हे पाने की हसरत नहीं, तुम याद रखो ये हसरत है।
तुम पास रहो ये चाह नहीं, तुम साथ रहो ये चाहत है।

साथ मेरे सब अपने है, पर तुम भी कोइ गैर नहीं।
सब जब मेरे साथ है, तुम क्यूं मेरे साथ नहीं।

मेरा था एक ये भी सपना, बनाऊं गैरो को भी अपना।
गैरो कि तो बातें छोरो, जब तोर गये अपने ही नाता।

अब तो बस ये लगते सपने, घर से बाहर होते अपने।
तुमपे मेरा अब भी विश्वास, तुम तोरोगे ना मेरी आस।

बनायी है जो तुमने दूरी, होगी कोई इसकी मजबूरी,
उम्मीद है तुमसे वफ़ा की, तुम दाग लगाओ न दगा की।

तुम जो मुझसे दूर गये, जीते जी मुझको मार गये।
क्यूँ नाता तुम तोर गये, जब यादो को छोर गये।

भले तुम आओ न आओ, याद तेरी याद आ जाती है।
तुम मुझसे मिलो न मिलो, वो गुजरे ळम्हे मिल जाती है।

-सन्नी कुमार

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद


रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ।
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ।
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी,
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ ।
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे ।
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।

माँ बहुत दर्द सह कर


– Amitabh Bachhan pays tribute to delhi rape victim with his poem. (Must read)

माँ बहुत दर्द सह कर,
बहुत दर्द देकर,
तुझसे कुछ कह पा रही हूँ …

आज मेरी विदाई में जब सखिया मिलने आएँगी…
सफ़ेद जोड़े में लिपटी देख, सिसक सिसक मर जायेंगी…
लड़की होने का खुद पे वो अफ़सोस जताएंगी…
माँ तू उनसे इतना कह देना, दरिंदो की दुनिया में संभल कर रहना…

माँ राखी पर जब भैया की कलाई सुखी रह जायेगी…
याद मुझे कर के जब उनकी आँख भर आएँगी…
तिलक माथे पर करने को रूह मेरा भी मचल जाएगा…
माँ तू भैया को रोने न देना…
मै साथ हूँ हर पल उनसे कह देना…

माँ पापा भी चुप चुप कर बहुत रोयेंगे …
मै कुछ न कर पाया ये कह कर खुद को कोसेंगे…
माँ दर्द उन्हें ये होने न देना,
इल्जाम कोई लेने न देना,
वो अभीमान है मेरा, सम्मान है मेरा…
तू उनसे इतना कह देना…

माँ तेरे लिए अब क्या कहु …
दर्द को तेरे शब्दों में कैसे बांधू…
फिर से जीने का मौका कैसे मांगू…

माँ लोग तुझे सतायेंगे…
मुझे आजादी देने का तुझपे इल्जाम लगायेंगे…
माँ सब सह लेना पर ये न कहना…
“अगले जनम मोहे बिटीया न देना”

समर शेष है


– रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो
किसने कहा, युद्ध की बेला गई, शान्ति से बोलो?
किसने कहा, और मत बेधो हृदय वह्नि के शर से
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?

कुंकुम? लेपूँ किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान?
तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान।

फूलों की रंगीन लहर पर ओ उतराने वाले!
ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले!
सकल देश में हालाहल है दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी शेष भारत में अंधियाला है।

मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार,
ज्यों का त्यों है खड़ा आज भी मरघट सा संसार।

वह संसार जहाँ पर पहुँची अब तक नहीं किरण है,
जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर-वरण है।
देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्तस्तल हिलता है,
माँ को लज्जा वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है।

पूज रहा है जहाँ चकित हो जन-जन देख अकाज,
सात वर्ष हो गए राह में अटका कहाँ स्वराज?

अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रक्खे हैं किसने अपने कर में ?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी, बता किस घर में?

समर शेष है यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा,
और नहीं तो तुझ पर पापिनि! महावज्र टूटेगा।

समर शेष है इस स्वराज को सत्य बनाना होगा।
जिसका है यह न्यास, उसे सत्वर पहुँचाना होगा।
धारा के मग में अनेक पर्वत जो खड़े हुए हैं,
गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज जो अड़े हुए हैं,

कह दो उनसे झुके अगर तो जग में यश पाएँगे,
अड़े रहे तो ऐरावत पत्तों -से बह जाएँगे।

समर शेष है जनगंगा को खुल कर लहराने दो,
शिखरों को डूबने और मुकुटों को बह जाने दो।
पथरीली, ऊँची ज़मीन है? तो उसको तोडेंग़े।
समतल पीटे बिना समर की भूमि नहीं छोड़ेंगे।

समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर,
खंड-खंड हो गिरे विषमता की काली जंज़ीर।

समर शेष है, अभी मनुज-भक्षी हुँकार रहे हैं।
गाँधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं।
समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है,
वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है।

समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
विचरें अभय देश में गांधी और जवाहर लाल।

तिमिरपुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्कांड रचें ना!
सावधान, हो खड़ी देश भर में गांधी की सेना।
बलि देकर भी बली! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर औ’ मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे!

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र,
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।