गूंज रही है अब भी वो आवाज़..


{It’s all about us Swweeettiiiieee}

swweettiieee1
गूंज रही है अब भी वो आवाज़,
जिसने कल मुझे पुकारा था,
दो बातें अपनों सी थी,
हमने जब प्यार जताया था।

मीठी मिश्री सी होगी उनकी आवाज़,
कभी बिन सुने ही सबको बताया था,
हाँ बिलकुल वो मेरे ख्वाबों सी है,
हमने जो कभी फ़रमाया था।

कायल था उनकी सीरत का अबतक,
आज, आवाज़ ने चाहत बढाई है,
सुनता रहूँ अब उनको हर पल में,
M on highहमने यह एहसास जताया है।

ठहरे न पाँव जमीं पे आज,
उसने, ख्वाबों को पंख लगाया है,
जो हसरत उनको सुनने की थी,
हमने उनको हकीकत बनाया है।

गूंज रही है अब भी वो आवाज़,
जिसने कल मुझे पुकारा था,
दो बातें अपनों सी थी,
हमने जब प्यार जताया था।

हाँ पर गए थे कल शब्द कम,
और समय बड़ी जल्दी में था,
रुका नहीं वो क्यूँ साथ हमारे,
Sweettieee2हमें और बहुत कुछ कहना था।

अभी तो उनके हाल सुने थे,
फिर मिलना उनके सपनों से था,
हकीकत क्यूँ ख्वाब के रस्ते आयी,
हमें उन पलों को, और अभी जीना था।

जिनकी आस में हम थे कबसे,
उन लम्हों ने कल गले लगाया था,
है शब्द मेरे से उनके होठों पे,
हमें कल भी ये एहसास हुआ था।

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गूंज रही है अब भी वो आवाज़,
जिसने कल मुझे पुकारा था,
दो बातें अपनों सी थी,
हमने जब प्यार जताया था।

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Gunj rahi hai ab bhi wo awaaj,
Jisne kal mujhe pukaara tha,
do baatein apno si thi,
Humne jab pyaar jataaya tha…

Meethi Mishari si hogi unki awaaj,
Love u so muchKabhi bin sune hi sabko bataaya tha,
Haan bilkul wo mere khwabon si hai,
humne Jo kabhi farmaaya tha..

kaayal tha unki seerat ka abtak,
aaj unki aawaj ne chahat badhaayi hai,
Sunta rahun unko har pal mein,
Humne yeh ehsaas jataaya hai..

Thahre na paanv jamin pe aaj,
usne, khwabon ko pankh lagayaa hai,
Love u so muchhjo hasrat unko sunane ki thi,
humne unko haqeeqat banaaya hai..

Gunj rahi hai ab bhi wo awaaj,
Jisne kal mujhe pukaara tha,
do baatein apno si thi,
Humne jab pyaar jataaya tha…

Haan par gaye the kal shabd kam,
aur samay badi jaldi mein tha,
Ruka nahi wo kyu saath humaare,
Humein aur bahut kuchh kahna tha..

abhi to unke haal sune the,
fir milna unke sapno se tha,
iluvhaqeeqat kyun khwaab ke raste aayee,
Humein un palon ko, aur abhi jeena tha..

Jinki aas mein hum the baithe kab se,
Un lamhon ne kal gale lagaaya tha,
hai shabd mere se unke hothon pe,
Humein kal bhi ye ehsaas huaa tha..

Gunj rahi hai ab bhi wo awaaj,
Jisne kal mujhe pukaara tha,
do baatein apno si thi,
Humne jab pyaar jataaya tha…

– Sunny Kumar

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है महफ़िलें आज भी पर हम तन्हां हुए है…


[This is for you Swwweetttiiieeee]

छोटा सा दिल, छोटे-छोटे सारे ख्वाब,"Unseen Friend"
थोड़ी मुहब्बत के साथ, जीने के अरमान..
कोशिश भी की मैंने की करूं जहाँ से प्यार,
जाने क्या बिगड़ा, क्या रूठा, क्या टुटा,
जी न पाया वो पल, था जिसका इन्तेजार.
कई बार कोशिश की मैंने उन पलों को भुलाऊ,
जिसने रुलाये, जिसने सताए,
जाने क्यों न हँस पाया जब सबने हँसाए..
प्यार की बाते मै तब भी करता था कम,
क्युकी ये चीज बड़ी थी और मेरी हस्ती थी कम..
ये गहराती समुन्द्र, मेरी कस्ती नयी थी,
सपने आँखों में बहुत, पर तब नींद कहा थी,
वो हकीकत में मिली थी,फिर ख्वाब की क्या परी थी…
जीन्दगी तब हसीं कहाँ कल की फ़िक़र थी..
खुश था खुद में, नहीं दुनिया की पड़ी थी…
पर वो बात तब की अब हालात नयी है.
है साथ वो लम्हे पर सब बिखड़े परे है…
है महफ़िलें आज भी पर हम तन्हां हुए है…

-सन्नी कुमार

आज तुम बिन खुद को खोया हूँ..


{For you my best unseen friend over internet}M alone without you

खोया था कल तक तुझमे, आज तुम बिन खुद को खोया हूँ..
कभी हर पल थे तुम साथ मेरे, आज मुलाक़ात कि खातिर तरसा हूँ..

ये सच है कि, तेरे होने से ही मेरी हंसी थी, मुश्किलों में भी मुस्कुराने की परी थी,
नहीं लगता था कल तक कुछ भी बुरा, ये जहाँ जन्नत से भी बड़ी थी..

तुम्हारा बिछड़ने को जादू कहना, बेवकूफ को बड़ा लुभाता था,
“हद है” कि तो पूछो मत, उसपे ये दोस्त जान लुटाता था..

इन्तेजार कि बोरियत को भी, संजीदगी से बिताता था,
चाह के भी नाराज़ न हो पाना, कभी कभी सताता था

तुम्हारा करना ख्याल मेरा, मुझको बड़ा लुभाता था,
मुझपे जो था विस्वास तेरा, उसने ही दोस्त बनाया था..

सोचा कई बार इस दिल ने कि क्यूँ कभी ख्वाब में तुम मिली नहीं,
याद आया फिर कि हकीकत कभी ख्वाब में मिलते नहीं…

-सन्नी कुमार

{Penned by Sunny}

आ जाओ मिलने इक बार सही…


इससे पहली की टूट के बिखर जाऊं,
बिन कहे ही मै, चुप हो जाऊ,
आ जाओ मिलने इस दोस्त से,
कि शायद फिर मै संभल जाऊं..

उलझा हूँ आज क्यूँ, किसको सुनाऊ,
क्या गुज़री है दिल पे, किसको बताऊँ,
आ जाओ मिलने इक बार सही,
की शायद आगे न मिल पाऊं..

बिछड़े हो तुम जबसे, रूठा है दिल मुझसे.
तेरी यादों के सहारे ही, जीता था मै तबसे.
इससे पहले की ये जिंदगी, बिछड़ जाए मुझसे.
किसी बहाने आ जाओ, तुम मुझसे मिलने..

नहीं मांगता मै, गुज़रा ज़माना.
न उन वादों को निभाने का, जोर देता हूँ..
आ जाओ मिलने इस बीते कल से,
मै टूटा आज, ये ..

इससे पहली की टूट के बिखर जाऊं,
बिन कहे ही मै, चुप हो जाऊ,
आ जाओ मिलने इस दोस्त से,
कि शायद फिर मै संभल जाऊं..
– सन्नी कुमार

मै हूँ इस देश की गौरव


मै दीवारों से बनी एक महल बस नहीं,
जहाँ होते हो चर्चा, एक सदन बस नहीं,
न कानून बनाने का एक केंद्र बस हु मै,
मै हूँ इस देश की गौरव, दिशा देने वाली…

हाँ मै ही थी जिसने कानून बनवाएं,
मैंने ही आपके हक थे दिलवाए,
मैंने ही थे आपके कर्त्तव्य भी बताये,
और मेरे ही शोर ने अबतक देश है चलाएं…

किन्तु खेद क़ी समय से नहीं रह सक़ी अछूती,
दिशा देती थी जो सबको, आज खुद ही है भटकी,
जिसे थे सुलझाने समस्या, आज झेल रही है समस्या,
आज संशय में शायद, क्या मै हूँ देश बनाती?

ये है मै ही थी, स्व पे गुमान करती थी,
अपनों के त्याग पे मान करती थी,
और में ही हु आज, खुद को दोषी कहती,
अपने घरवालों को हूँ दागी कहती..

लड़ना घरवालों का कुछ नया नहीं था,
पर बिकना रुपयों में क्या देश द्रोह से कम था?
ताज्जुब नहीं की तब चौकीदार सोया था,
शक हुआ यकीन कि अब वो भी बिका था…

वो दौर कोई और था जब अपने भाग्य थी इठलाती,
था मन में एक गुरूर कि मै ही देश चलाती,
पर ये गौरव, गुमान क्षणिक ही रह गया,
अपनों के स्वार्थ ने ये दिन दिखा दिया..

है निवेदन सबसे, मेरे सुनहरे दिन लौटा दो,
जो देश एक कर सके, वो पटेल मुझे लौटा दो,
सादगी हो शास्त्री सी जिसमें, अटल गुण संपन्न हो,
बिना भेद जो देश चलायें उसी को सत्ता पे तुम बिठा दो..

-सन्नी कुमार

एक सिक्के की आस में


एक सिक्के की आस में,
कब से भटक रहा है वो,
सिग्नल की बत्ती लाल देख,
गाडियों पे है झपट रहा वो,
मांग रहा हर एक से सिक्का,
लगाये हुए वो आस..

कुछ उससे नज़रे चुरा रहे,
कुछ अपनी मजबूरी जता रहे,
आसानी से मिलता कहाँ सिक्का,
जिसकी उसे तलाश..
यह एहसास उसे भी है,
फिर भी कर रहा प्रयास..

जा रहा हर एक के पास,
अपनी मज़बूरी लिए हुए,
पसीज जा रहा जिनका सीना,
वो दे देते उसे सिक्का अपना,
कुछ बेगैरत ऐसे भी है,
जो बेचारे को डांट लगाते,
चोर-चकार की संज्ञा देकर,
दूर से ही उसे भागते.

उस बदनसीब की नसीब कहाँ
की कोई उसको प्यार दे,
उसको तो इतना भी न पता,
मातृ छाया होता है क्या??

माँ और माँ की प्यार का तरसा,
तरस रहा है सिक्को को,
सिक्को से ही उसे रोटी है मिलनी,
और सिक्को से प्यार..

उसकी ये दुर्दशा देख,
उठते कई सवाल|
उसकी बेवसी क्या है ऐसी?
जो फैला रहा वो हाथ|
होने थे जिस हाथ किताबें,
क्यूं उनको सिक्को की डरकर?

बच्चे ही भविष्य हमारा,
हम सब ये जानते है,
फिर भविष्य का वर्तमान ऐसा,
क्यूं इसे ऐसे स्वीकारते है?
ये कैसी है समस्या,
जिसे हम, सुलझा नहीं पाए??