सांप्रदायिक हिंसा विधेयक: संशोधन हो. अधिनियमित हो. [ अभी !]


धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी शर्म की बात नहीं हो सकती कि धर्म, जाति, संप्रदाय और क्षेत्र के नाम पर अपने ही नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का सार्वजनिक चीरहरण हो.  अत्यधिक संत्रस्त कर देने वाली मुजफ्फरनगर की हालिया घटना इसी का नमूना है. कमजोर अर्थव्यवस्था की पृष्ठभूमि में मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगा- न केवल अर्थव्यवस्था के संकट को गहराने वाला है बल्कि देश के बाहर-भीतर लोगों को देश को ‘विफल राष्ट्र’ मानने पर मजबूर करता है. इस आग का असर महज पश्चिमी उत्तरप्रदेश के जिलों तक सीमित नहीं. इसने बागपत, उन्नाव, बुलंदशहर, बहराइच, बिजनौर, जैसे शहरों और उनके आसपास के इलाकों के लोगों के विचारों और प्रक्रियाओं को प्रभावित किया है. इससे बुरा क्या होगा कि ऐसे भड़काऊ सांप्रदायिक अशांति  का सिरा केवल असामाजिक तत्वों के हाथ होता है. देश के तमाम क्षेत्रों के विभिन्न सामाजिक समूहों में दरार की वजह यही हैं.
इस सामाजिक प्लेग के उन्मूलन की रामबाण दवा क्या है?  एक पुनर्लिखित शक्तिशाली सांप्रदायिक हिंसा विधेयक. लेकिन इस नए विधेयक के पारित होने से पहले राजनीतिक तंत्र में कुछ मौलिक परिवर्तनों की जरूरत है. एक दूसरे समुदाय के खिलाफ हिंसा- हटिया और रांची से मुजफ्फरनगर से गोधरा तक –निर्विवाद तौर पर भारतीय राजनीति की पुरानी खासियत रही है. सांप्रदायिक दंगों पर नजर डालें, ये पिछले छह दशकों से देश के लिए शर्मिंदगी की वजह हैं. लगभग हरेक की अपनी अजीब खासियत रही. ऐसी आग को हवा देना उन सियासी दलों के लिए फायदेमंद है जो उन धार्मिक या जाति समूह का मसीहा बताते हैं जो चुनाव में उनका वोटबैंक होते हैं. हम उन कुछ चुनिंदा देशों में से हैं जहां राजनीति और र्धर्म हाथ में हाथ ड़ाल कर काम करते हैं. कई देशों ने इनको अलग रखने की नीति अपना रखी है. आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था के संदर्भ में लें तो  1802 में थॉमस जेफरसन ने चर्च को सत्ता से अलग रहने के महत्व को रेखांकित किया था. दरअसल इससे पूर्व अमेरिकी संविधान के प्रथम संशोधन (15 दिसंबर 1791 को अंगीकृत ) में,  स्पष्ट किया गया कि, ” कांग्रेस धर्म स्थापना संबंधी कोई कानून नहीं बनाएगी…” इसी तर्ज़ पर सांप्रदायिक हिंसा विधेयक को परिवर्तित कर कानून के रूप में पारित करें, सहायक कानूनों का धर्मनिरपेक्ष होना और उनके बारे में यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वे किसी धर्म या समूह विशेष के पक्ष में नहीं हैं. मौजूदा सरकार ने काफी समय से सांप्रदायिक हिंसा विधेयक पर ध्यान नहीं दिया है. ऐसे कानून के अभाव में सांप्रदायिक दंगों के दौरान राज्य से संबंधित मामलों में केंद्र सरकार,केंद्रीय अधिकारी कार्रवाई करने यहां तक कि हस्तक्षेप करने के लिए भी अधिकृत नहीं होते. सांप्रदायिक हिंसा विधेयक विकट स्थितियों में केंद्र सरकार राज्य की आग बुझाने में सशक्त सहायक हो सकेगा. यही नहीं यह सांप्रदायिक सद्भाव, न्याय की स्थापना हेतु राष्ट्रीय प्राधिकरण कहे जाने वाले विशेष टास्क फोर्स की स्थापना और जब भी जरूरी हो इसकी सक्रियता सुनिश्चित करेगा. 
2013 अगस्त तक सांप्रदायिक हिंसा के 451 मामलों की तुलना  2012 की 410 घटनाओं से करें- क्या ये संख्याएं ऐसे महत्वपूर्ण विधेयक को तत्काल लाने की आवश्यकता जताने को काफी नहीं हैं?  वर्तमान में समारोहों और जुलूस के दौरान विषवमन को पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स इज़ाजत न होने से रोकने की कार्यवाई में असहाय पाता है.  उदाहरणत: मुंबई दंगों की जांच करने वाले श्रीकृष्ण आयोग (1992 ) ने कहा था, ‘पुलिस ने उन दंगाइयों और विषवमन करने वालों पर तब तक लगातार निगाह रखी थी जब तक कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढहा नहीं दी गई. दंगे के लिए जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार करने का यहां तक पुलिस को उनकी गतिविधियों पर सवाल उठाने तक के पर्याप्त अधिकार और अनुमति नहीं थी’. अपने मौजूदा स्वरूप में विधेयक को विशेष न्यायालय (मुकदमा चलाने के लिए) या पीड़ित को सशक्तीकरण, मुकदमे के दौरान गवाहों की सुरक्षा देने वाला होना चाहिए. लेकिन यदि यह विधेयक ‘अल्पसंख्यक’ और ‘बहुसंख्यक’ के बीच विभाजन रेखा खींचता है तो यह उसकी सबसे बड़ी गलती होगी’ : और यही वह जगह है जहां मैं ‘चर्च (पढें: धर्म) और सत्ता से अलगाव की अवधारणा को लाना चाहता हूं. किसी भी परिस्थिति में एक धर्मनिरपेक्ष देश को किसी धार्मिक समूह या धर्म विशेष के लिए अलग से मुकदमा चलाने, विशेष कानून अथवा प्रणाली नहीं बनाने चाहिए. इस विधेयक को धर्म (या किसी भी तरह के)  भेदभाव से मुक्त तथा निष्पक्ष रखें तो वास्तव में जिस उद्देश्य हेतु इसकी अवधारणा तैयार की गई थी उसकी सेवा में यह एक लंबा रास्ता तय करेगा. धर्म या जाति के आधार पर विभेद करने वाले प्रावधान और कानून अपने आप में गैर धर्मनिरपेक्ष और सांप्रदायिक हैं तथा केवल राजनीतिक हितसाधन के उपकरण और असामाजिक तत्वों को प्रोत्साहन देने वाले हैं.
 हमने कहां से शुरुआत की थी?  धर्म और कानून अलग अलग  हों, सुनिश्चित करें कि ऐसा कानून जो धर्म (विशेषत: अपराध के लिए) और जाति के आधार पर व्यक्तियों में भेद करे ऐसे  कानूनों को भारतीय हवा में सांस लेने की अनुमति नहीं हो. किसी भी हालात में जरायम जायज़ नहीं है. बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक धाराओं को हटाने के बाद और हर पीड़ित के लिए चाहे वे किसी धर्म, जाति, संप्रदाय और क्षेत्र के हों उनके लिए उत्कृष्ट प्रावधानों को शामिल करने के पश्चात इस सांप्रदायिक विधेयक को शीघ्र ही पारित किया जाना चाहिए.

अरिंदम चौधरी

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