सुधार का अंतिम अवसर


22upa1संप्रग सरकार अपने दूसरे कार्यकाल के आखिरी वर्ष में प्रवेश कर गई है। कुछ लोगों के लिए यह हैरत की बात हो सकती है कि भ्रष्टाचार, निष्क्रियता और तालमेल के अभाव के साथ-साथ नीतिगत अपंगता से उत्पन्न अर्थव्यवस्था की समस्याओं के बावजूद इस सरकार ने चार साल कैसे पूरे कर लिए? कम से कम इस सवाल के आधार पर तो संप्रग सरकार को चार साल तक चलने का श्रेय दिया ही जा सकता है। संप्रग सरकार अपने चार साल के कार्यकाल को लेकर तमाम दावे भले ही करे, उसके पास यह बताने को नहीं कि उसने इस दौरान देश को क्या दिया? इस कार्यकाल के चार वर्ष और कुल मिलाकर केंद्र की सत्ता में नौ वर्ष पूरे करने के उपलक्ष्य में सरकार की ओर से जो रिपोर्ट कार्ड जारी किया गया उसमें अनेक उपलब्धियों का जिक्त्र अवश्य है, लेकिन उन पर सरसरी निगाह डालने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि उनमें एक भी ऐसा कार्य नहीं है जिसे देश को नई ऊर्जा देने अथवा विकास के नए पैमाने लिखने वाला कहा जा सके। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि सरकार एक के बाद एक घपले-घोटालों को लेकर विपक्ष, आम जनता और मीडिया के दबाव को ही झेलती रही। चाहे 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में धांधली का मामला रहा हो अथवा कोयला आवंटन में गड़बड़ी का-भ्रष्टाचार के इन मामलों ने सरकार की निर्णय लेने की क्षमता पर व्यापक असर डाला।

संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल और दूसरे कार्यकाल के शुरुआती दौर में प्रणब मुखर्जी संकटमोचक की भूमिका में थे, लेकिन जिस तरह उन्हें राष्ट्रपति बनाने का फैसला लिया गया उससे न केवल सरकार के कामकाज और संकट से निकलने की उसकी क्षमता पर असर पड़ा, बल्कि आम जनता में यह संदेश भी गया कि सरकार के भीतर सब कुछ सही नहीं। पिछले दिनों तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीच मतभेद की खबरें भी सामने आईं। भले ही इन खबरों का खंडन कर दिया गया हो, लेकिन कहीं न कहीं प्रधानमंत्री के संदर्भ में यह धारणा बनने लगी है कि वह सरकार को सही तरह से नेतृत्व नहीं दे पा रहे हैं। हर तरह की समस्याओं के निराकरण के लिए प्रधानमंत्री आमतौर पर मंत्रिसमूह का गठन कर देते हैं। इसके चलते वह समस्या विशेष से जूझते हुए दिखने के बजाय उससे कन्नी काटते नजर आते हैं। मौजूदा हालात में केंद्र सरकार की ओर से अपनी चौथी वर्षगांठ पर रिपोर्ट कार्ड के जरिये अपनी पीठ थपथपाना बेमानी ही लगता है। इस पर करीब-करीब सभी ने कटाक्ष किया। मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने तो यहां तक कहा कि केंद्रीय सत्ता को अपनी उपलब्धियों का गुणगान करने के बजाय देश से माफी मांगनी चाहिए। भाजपा की इस कठोर आलोचना का आधार हो सकता है, लेकिन वह खुद भी इस सवाल से बच नहीं सकती कि जब यह सरकार इतनी ही नाकाम है तो वह उसे गिरा क्यों नहीं पाई? सच तो यह है कि देश के मौजूदा माहौल के लिए जितना जिम्मेदार सत्तापक्ष है उतना ही विपक्ष भी है। सत्तापक्ष और विपक्ष के टकराव के चलते जिस तरह एक के बाद एक संसदीय सत्र बर्बाद होते गए उससे निराशा का माहौल और अधिक गहराया। अगर संसद नहीं चलेगी तो उसका असर देश के विकास पर अवश्य पड़ेगा।

राजनीतिक तौर पर कोई भी सरकार अपनी कमियों को स्वीकार नहीं करती और मनमोहन सरकार ने भी ठीक ऐसा ही किया। सरकार का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुए प्रधानमंत्री ने यह तो स्वीकार किया कि कुछ कमियां रह गई हैं, लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि हर चीज ठीक करना आसान नहीं है। उनका यह बयान देश की जनता को हतोत्साहित करने वाला है। नित नए उजागर होते घपलों और उनके प्रति सरकार के रवैये से तो ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री या गांधी परिवार की ओर से देश को जो आश्वासन दिए जा रहे हैं वे खोखले ही हैं। यह निराशाजनक है कि सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार का घुन सा लग गया है और फिर भी उसके नीति-नियंता कोरे आश्वासन दे रहे हैं।

इस सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में सामाजिक क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण काम किए थे, लेकिन दूसरे कार्यकाल में ऐसे कायरें की गिनती करना मुश्किल है और जिन आगामी योजनाओं के जरिये गुलाबी तस्वीर दिखाई जा रही हैं उनका मुख्य उद्देश्य वोट जुटाना ही नजर आता है। केंद्र सरकार यह समझने से इन्कार कर रही है कि रियायतों के सहारे जरूरतमंद वगरें का भला नहीं किया जा सकता। मनरेगा हो अथवा सब्सिडी आधारित अन्य योजनाएं-इनसे किसी जरूरतमंद परिवार को कुछ तात्कालिक सहायता तो मिल जाती है, लेकिन सरकारी खजाने पर उनका बहुत बुरा असर होता है। हाल में यूरोपीय देशों को जिस आर्थिक संकट से जूझना पड़ा उसके केंद्र में ऐसी ही योजनाओं के रूप में सरकारी कोष की बर्बादी ही थी। यह विचित्र है कि भारत भी उसी राह पर बढ़ता नजर आ रहा है। केंद्र सरकार जिस खाद्य सुरक्षा कानून को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बता रही है और उसके जरिये दो तिहाई निर्धन आबादी को राहत देने की घोषणा कर रही है वह अपने मौजूदा स्वरूप में सरकारी खजाने की कमर तोड़ने वाला साबित हो सकता है। दुर्भाग्य से केंद्र की सत्ता संभालने वाली किसी भी सरकार ने इस पर गौर करना आवश्यक नहीं समझा कि लोक-लुभावन योजनाएं और रियायतें सरकारी कोष और अर्थव्यवस्था की दशा किस तरह बिगाड़ देती हैं। इस लोक-लुभावन राजनीति का ही नतीजा है कि देश के विकास के लिए जैसा उद्योगीकरण होना चाहिए था वह नहीं हुआ।

आज सरकारी नीतियों से सबसे अधिक उद्योग-व्यापार जगत ही त्रस्त है। वोट बैंक की राजनीति के तहत सरकारें किसानों के तो ऋण माफ कर रही हैं, लेकिन ऊंची ब्याज दरों के कारण व्यापार और उद्योग जगत को जो घाटा हो रहा है उस पर ध्यान देने के लिए तैयार नहीं हैं। भारत का उद्योग और व्यापार जगत एक छोटे से सहारे की ही आशा कर रहा है। अगर उसे यह सहारा मिल सके तो अर्थव्यवस्था की तस्वीर बहुत जल्द सुधरने लगेगी। ध्यान रहे कि निराशा के इस माहौल में भी देश के कुछ राज्यों और खासकर मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्ताीसगढ़, हरियाणा, बिहार आदि ने बेहतर काम किया है। केंद्र सरकार इन राज्यों की उपलब्धि्यों पर अपनी पीठ थपथपा सकती है, क्योंकि कोई भी राज्य सिर्फ अपने ही दम पर विकास के मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकता। केंद्रीय योजनाओं का राज्यों के विकास में एक विशेष महत्व होता है।

अब अगला एक वर्ष देश के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण होगा। भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता से जूझ रही केंद्र सरकार के लिए यह अंतिम मौका है कि वह कुछ कर दिखाए। सरकार को इसका अहसास होना चाहिए कि ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं हो सकती जो वषरें की नाकामी को पल भर में सही कर दे, फिर भी अगर वह चाहे तो कुछ करते हुए दिख सकती है, खासकर भ्रष्टाचार के दाग मिटाने के मामले में। जब ये दाग मिटेंगे तभी देश में निराशा का वह माहौल दूर होगा जो हर दिन घना होता दिखता है।

[लेखक संजय गुप्त, दैनिक जागरण के संपादक हैं; source- दैनिक जागरण]

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