एक ही अरविंद केजरीवाल काफी है, अफसोस कि है भी सिर्फ एक!


Imageअरविंद केजरीवाल के हमले मुझे हैंस क्रिश्चियन एंडरसन की कहानी ‘द एंपरर्स न्यू क्लॉथ्स’ याद दिलाती है जिसमें दो बुनकर सम्राट के लिए नई पोशाक बनाने हैं और उसे बताते हैं कि यह केवल ईमानदार और वफादार लोगों को दिखाई देगी. सम्राट ने वफादारों की परीक्षा के लिए पोशाक पहनी, मगर उससे नागरिकों में कौतुक फैल गया. केजरीवाल कहानी वाले उस बच्चे की तरह हैं जो सम्राट पर हंसता है और चीखने की हिम्मत करता है कि सम्राट नंगा है, उन्होंने ऐसे कई स्वयंभू राजनीतिक और कॉर्पोरेट सम्राटों के चेहरे से मुखौटे नोच डाले हैं.

कथित भ्रष्ट राजनीतिक दलों, कांग्रेस और भाजपा, के खिलाफ केजरीवाल के घातक खुलासे ने सरकार और उद्योग की सांठगांठ को मुश्किल में डाल दिया है. इसकी शुरुआत बहुप्रतिष्ठित रॉबर्ट वाड्रा से हुई जिनके सौदों पर बरसों से धीमे स्वर में सवाल उठ रहे थे. अरविंद ने आरोप लगाया कि डीएलएफ ने रॉबर्ट वाड्रा को अनुचित लाभ पहुंचाया, वाड्रा ने 500 करोड़ रुपये की जायदाद खरीदने में काले धन का प्रयोग किया और बदले में 65 करोड़ रूपये का ब्याजमुक्त कर्ज, रियायती आवासीय भवनों के अलावा भी उन्हें बहुत कुछ मिला. वाड्रा के कांग्रेस ‘संबंधित’  होने के कारण हरियाणा के ताकतवर लोगों ने डीएलएफ को सार्वजनिक उपयोगिताओं के लिए निर्धारित जमीन (जिसमें हरित पट्टी शामिल है) एक्सप्रेस लेन तक के लिए आसानी से दे दी.
अरविंद ने रॉबर्ट के बाद कम महत्वपूर्ण सलमान खुर्शीद और नितिन गडकरी के मामले उजागर किए! 31 अक्टूबर, 2012 को, केजरीवाल ने सत्ता समर्थित पूंजीवाद के नमूने के तौर रिलायंस और राजनेताओं का गठजोड़ उजागर किया कि कैसे कांग्रेस ही नहीं पूरे राजनीतिक तंत्र ने रिलायंस को अनुचित रूप से उपकृत किया है. केजरीवाल की प्रेस विज्ञप्ति कहती है, “आरआईएल को 80% से अधिक मुनाफा मिलता है और सरकार को 20 फीसदी से कम.” केजरीवाल यह भी कहते हैं कि रिलायंस को देश के संसाधनों की लूट से 1 लाख करोड़ रुपये मिले. उन्होंने पेट्रोलियम मंत्री के चयन में रिलायंस की भूमिका का आरोप भी लगाया.
अरविंद के उठाए भ्रष्टाचार के पेचीदे सवालों ने कइयों को बेनकाब कर दिया. केजरीवाल का आरोप है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अनुबंध के बीच में ही रिलायंस की गैस की कीमत बढा़ने की मांग को महालेखाकार को भेज दिया, जबकि एनटीपीसी तक को यह सुविधा देने पर विचार नहीं किया गया! और कृष्णा गोदावरी बेसिन अनुबंध मामले में भी, 17 साल के लिए गैस की कीमत 2.5 डॉलर प्रति यूनिट तय होने के बावजूद, रिलायंस 2007 में  प्रधानमंत्री की कृपा से दर संशोधन के बाद 4.25 डॉलर प्रति यूनिट कराने में सफल रही, फिर उसने 14.24 डॉलर प्रति यूनिट वसूलने की मंशा जताई. रिलायंस ने अनुबंध तोड़ा और निर्धारित 80 एमएमएससीएमडी गैस का उत्पादन बंद कर दिया, मगर प्रधानमंत्री ने कोई चिंता नहीं जताई. मंत्रालय के जिस एक व्यक्ति ने आपत्ति की और रिलायंस को बतौर जुर्माना 7000 करोड़ की नोटिस भेजी, वह थे पूर्व पेट्रोलियम मंत्री जयपाल रेड्डी, जिन्हें बर्खास्त कर दिया गया. केजरीवाल आगे कहते हैं कि 2006 में मुरली देवड़ा को मणिशंकर अय्यर की जगह लाया गया क्योंकि उनकी मुकेश अंबानी से बनती थी तथा उन्हें गैस की कीमत 2.34 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू से 4.2 डॉलर करने में कोई हिचक नहीं थी.
बड़ा मुद्दा तो मुकेश और रॉबर्ट से परे है. देश को लूटने के इस खेल को द संडे इंडियन अपनी शुरुआत से ही उजागर करता रहा है. भूमि अधिग्रहण और एसईजेड हो, लौह अयस्क और कोयला खानें हों, मोबाइल फोन स्पेक्ट्रम, बिजली वितरण और शुल्क हो, या फिर परमाणु संयंत्रों हो… प्राकृतिक संसाधनों और राष्ट्र हित का कोई भी मामला हो, ऐसे हर मामले में जिसमें सत्ता आम आदमी के खिलाफ बेशर्मी के साथ कॉर्पोरेट वर्ग के पक्ष में खड़ी होती है और सत्ता समर्थित पूंजीवाद को बढ़ावा देती है. अफसोस, जब तक कि केजरीवाल सरीखे सामाजिक कार्यकर्ता इन मुद्दों को नहीं उठाते तब तक मीडिया फुसफुसातते हुए गपशप भर ही करती है.
केजरीवाल और उनके संगठन ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ का उदय सही मायने में क्रांति और आंदोलनों की लहर है जिसमें भारत के पुनर्निर्माण की क्षमता है, बस अरविंद अपनी गति बनाए रख सकें. केजरीवाल ध्यान और शांतचित्त बहादुरी के प्रतीक बन गए हैं, वे हर बार सम्मोहक तर्क और सबूत के साथ बात करते हैं, यही उनकी खासियत है. बेशक, वह बहुत होशियारी से मीडिया का प्रयोग कर रहे हैं! आज उनसे छुटकारा पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो उनका भारत में तहरीर चौक बनाने का सपना सच हो सकता है. केजरीवाल कोई ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जिनके लिए लोग लड़ेंगे नहीं. भारतीय राजनीति में वर्चस्व के लिए अरिवंद के पास कांग्रेस और भाजपा की तरह विशाल काडर या कार्यबल नहीं है जिससे भारत के कोने-कोने तक पहुंचा जा सके. इसलिए वह टीवी और अखबारों की पहुंच पर निर्भर हैं, और इससे देश में उनका प्रभाव सीमित हो जाता है. हालांकि, भारत में भ्रष्टाचार के घिनौने संजाल के नग्न सत्य को खोद निकालने की उनकी प्रवृत्ति का भारत और पूरे क्षेत्र पर जबरदस्त प्रभाव पड़ेगा. साफ तौर पर यह देश की सफाई की लंबी लड़ाई की शुरुआत है. भ्रष्टाचारियों पर सीधा हमला कर केजरीवाल ने दिखा दिया है कि यथास्थिति बदलने को एक केजरीवाल ही काफी है. अफसोस, फिलहाल, एक ही केजरीवाल है.
(The views expressed in the blog are that of the author, Arindam chaudhary, and originally posted in The Sunday Indian)

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