यूपी-बिहार में अंग्रेजी सिखाओ अभियान ताकि वहां जाकर आप नरभसा न जाएं – “ओंकारेश्वर पांडेय “


भाषा को लेकर देश के अलग अलग प्रांतों से दिलचस्प खबरें आ रही हैं. खबर है कि तमिलनाडु में अंग्रेजी का विरोध हो रहा है. और बिहार में महादलितों को अंग्रेजी की खास कोचिंग करायी जा रही है. और युवा मुख्यमंत्री अखिलेश कुमार के उतर प्रदेश में अंग्रेजी पढ़ाने का उत्तम विचार सामने आया है. मैं मूल रूप से भारतीय भाषाओं का प्रबल समर्थक हूं. पर  विदेशी भाषाओं का वैसा घोर विरोधी नहीं हूं, जैसा रूस में दिखता है. आप मॉस्को जाएंगे तो वहां सड़कों के संकेत चिह्न से लेकर साइन बोर्ड तक और आम आदमी से लेकर कम्प्यूटर और टीवी तक रूसी भाषा में “सायोनारा” करते नजर आएंगे. अंग्रेजी जानने वाले मुश्किल से मिलते हैं. इससे विदेशियों को बड़ा कष्ट होता है. चीन में भी होता है. हालांकि वहां अब अंग्रेजी सिखायी जा रही है. पर अपने महान भारत देश में अंग्रेजी जानने वाला कोई भी देश के कोने कोने की सैर कर सकता है. ये और बात है कि यूपी-बिहार आदि में कई बार आपको ऐसी अंग्रेजी सुनने को मिल सकती है, जिससे आप वैसे ही नरभसा सकते हैं, जैसे स्व. शरद जोशी करीब एक दशक पहले पटना जाकर नरभसा गये थे. और मुझे तो बनारस में एक विदेशी लेखक का वह रोचक अनुभव याद आ रहा है, जिसमें उन्होंने वहां के कुछ लोगों से सुनी अंग्रेजी भाषा के वाक्यों का जिक्र किया था. वाकया कुछ यूं था- एक व्यक्ति अपनी बात कह रहा था. कह क्या रहा था, अंग्रेजी भाड़ रहा था. दूसरे व्यक्ति बड़ी देर तक सुनते रहे, और जब नहीं रहा गया तो उन्होंने बीच में उन्हें टोकने की कोशिश की. इस पर तुनक कर पहले वाले सज्जन ने उनको अंग्रेजी में डांटा – “व्हेन आई स्पीक, आइये स्पीक, व्हेन यू स्पीक, युवे स्पीक, बट डोंट स्पीक मिडिले मिडिले”. लेकिन अब चिंता मत कीजिये भाई साहब, यूपी-बिहार की अंग्रेजी सुधरने वाली है. बिहार में इसकी शुरुआत एक स्मार्ट बिहारी बीरबल झा ने की है. श्री झा ब्रिटिश लिंगुआ नामक भाषा सिखाने वाली कंपनी कई राज्यों में चलाते हैं. उन्होंने बिहार सरकार के साथ मिलकर प्रदेश के महादलितों को अंग्रेजी सिखाने का बीड़ा उठाया है. कुछ जिलों में प्रयोग के तौर पर इसे शुरु कर दिया गया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे विकास की राह पर तेजी से अग्रसर बिहार के दलित समाज के लोग अवश्य लाभान्वित होंगे. वैसे बिहार प्रतिभासंपन्न लोगों की खान है. बिहारी चूकते सिर्फ भाषा को लेकर ही हैं. लेकिन सीख जाएं तो फिर इसमें भी वे राष्ट्रीय ही नहीं विश्व स्तर पर मात दे सकते हैं. हिंदी, उर्दू, भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका, वज्जिका आदि भाषाओं वाला बिहार अंग्रेजी सीख बोलकर लालू जैसों को भी “जेंटलमैन” बना दे तो इसमें कोई बुराई नहीं है. बल्कि इससे प्रदेश की छवि ही सुधरेगी. आने वाले दिनों में शायद आपको बिहार जाकर नरभसाना न पड़े.

अंग्रेजी सिखाने का कुछ इसी तरह का प्रयास अब उत्तर प्रदेश में भी होता दिख रहा है. इस पर खास जोर दे रहे हैं, प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव. हाल ही में श्री यादव ने कहा कि सर सैयद अहमद ने जो सोचा, जिस मकसद से एक मिशन के रूप में अल्पसंख्यकों को अंग्रेजी पद्धति से तालीम दिलाने के लिए विश्वविद्यालय स्थापित किया, मौजूदा समय में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ गयी है. लखनऊ में सर सैयद अहमद डे के मौके पर आयोजित एक समारोह को सम्बोधित करते हुए श्री यादव ने कहा कि शिक्षित समाज ही आगे बढ़ता है और तरक्की के लिए पढ़ाई को ही सीढ़ी बनाया जा सकता है. अखिलेश यादव प्रदेश के युवाओं को अंग्रेजी पढाने से पहले कम्प्यूटर साक्षर बनाने और लैपटॉप व टैबलेट देने की बात भी कर चुके हैं. और उनके मिशन को सफल बनाने का बीड़ा उठाया है. सहारा इंडिया परिवार के प्रबंध कार्यकर्ता एवं चेयरमैन सहाराश्री सुब्रत रॉय सहारा ने. सहाराश्री ने कहा है कि गांव-गांव में अंग्रेजी पहुंचाना जरूरी है और इस मिशन की पहल सहारा इंडिया परिवार करेगा. उन्होंने कहा कि आगामी तीन-चार महीनों में  सहारा टीवी के माध्यम से प्रदेश भर में शिक्षा दी जाएगी. इसमें अंग्रेजी की शिक्षा देने पर खास जोर होगा. वे कहते हैं कि साक्षरता या फिर नौकरी के लिए डिग्री की पढ़ाई नहीं होती है बल्कि इससे समाज की तरक्की की बुनियाद तैयार होती है.
यूपी और बिहार में अंग्रेजी पढ़ाने के ये अभियान इन दोनों राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व की बदलती मानसिकता को दर्शाते हैं. जो पहले अंग्रेजी का विरोध करते थे, वे अब इसे स्वीकारने और बढ़ाने लगे हैं. इससे इन दोनों प्रदेशों की प्रतिभाओं को और उभरने का मौका मिलेगा तो, बेहतर रोजगार के अवसर भी ज्यादा मिलेंगे. पर इन दोनों राज्यों में स्थानीय लोकभाषाओं को भी उसी गंभीरता से आगे बढ़ाना चाहिए. क्योंकि वैश्वीकरण के इस दौर में जहां अंग्रेजी एक अतंर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में स्थापित होती जा रही है, तो हिंदी, भोजपुरी आदि भाषाओं का रूतबा भी बढ़ रहा है. अभी ऑस्ट्रेलिया से ताजा खबर आयी है कि वह अपने देश के लोगों को हिंदी, चीनी आदि एशियाई भाषाएं सिखाने पर जोर देगा. लेकिन भारतीय मीडिया तो पिछले कई सालों से द्विभाषी होता जा रहा है. इससे जरूर हिंदी को ज्यादा खतरा होगा. पर टीवी, वेब और न्यू मीडिया के इस नये दौर में भाषाई बंधन की दीवारें गिर रही हैं. एक नये तरह का विश्व समाज बन रहा है. इसे कौन रोक पाएगा. मैं तो कहता हूं कि उनकी भाषा भी सीखें, पर अपनी भाषा को दिल से लगाये रखें और आगे बढ़ायें.
भाषा किसी व्यक्ति या समाज के पिछड़ेपन को तय करने का एक प्रमुख आधार बन गयी है. पर दुर्भाग्य से अपने देश में पिछड़ापन भाषा नहीं बल्कि जाति के आधार पर तय की जाती है. भारत में भाषा के प्रति सोच को व्यापक बनाने की जरूरत है. विकास का एक अहम जरिया है भाषा. इस बात को मैंने तभी महसूस कर लिया था, जब मैं गुवाहाटी में पत्रकारिता कर रहा था. 1989 में अपनी हिंदी – भोजपुरी के साथ कामचलाऊ अंग्रेजी के कुछ छुट्टे शब्द जेब में डालकर असम गया तो भाषा की अहमियत जरा ठीक से समझ में आयी. भाषा जानते हो तो, खबर भी मिलेगी और खाना भी. नहीं जानते तो कोई खैरख्वाह नहीं. काम हिंदी में करना था. पर सबकुछ पढ़ना अंग्रेजी या असमिया में. असमिया बड़ी मीठी और सुंदर भाषा है. असमिया लोगों की तरह ही. किसी के यहां जाने पर वे कहते – “बहोक”. तो ऐसा लगता कि कह रहे हों – “बढ़ो”.  च का उच्चारण स होता. इसलिए चाय की जगह साय हो जाता. हमारे एक मित्र सुधीर सुधाकर के नाम के साथ बड़ी दिक्कत होती. हमलोग किसी असमिया साथी को उनका पूरा नाम नहीं लेने देते थे.
खैर लाहे-लाहे (धीरे-धीरे) हमने समझने और बोलने भर असमिया सीख ली. और तब असमिया के सुंदर गीतों का रसास्वादन ठीक से कर पाया ….”मरमे धुंआय निया –जोनाकि कोमल बिजुली…तुमि आरू मोय आसुं बोही…एई निरी बिली गोधुली”…..
हमें लगता था कि हिंदी तो सब लोग जानते ही होंगे. पर असम जाकर महसूस हुआ कि हिंदी बहुत लोग जानते हैं, पर सब लोग नहीं. असम में असमिया, बंगला, बोड़ो, कार्बी आदि भाषाएं, तो मेघालय में खासी, गारो, जयंतिया, मणिपुर में मैतेई, नगालैंड में नगामिज, मिजोरम में मिजो आदि दर्जनों भाषाएं प्रमुखता से बोली जाती है. इनके बीच हिंदी भी काफी बड़ी संख्या में लोग जानते समझते और बोलते हैं, खासकर असम, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड आदि राज्यों में. लेकिन उससे कहीं ज्यादा स्वीकार्यता अंग्रेजी की है. असम में तो हिंदी के कम से कम चार बड़े अखबार निकल रहे हैं. लेकिन इन सभी राज्यों में सरकारी विभागों और निजी कंपनियों में काम सारा अंग्रेजी में ही होता है. करीब 17 साल पहले मैं 1995 में दिल्ली आया. गुवाहाटी से तबादला पहले तो पटना होने की बात थी. लेकिन हुआ दिल्ली. दिल्ली आया तो विनोद दुआ जैसे टीवी के महारथियों के साथ काम करने का अवसर मिला. एक दिन दुआ जी ने कहा- ओंकार, अगर हिंदी में सफल होना है तो अंग्रेजी में गाली देना सीख लो. तब से मैंने गांठ बांध ली, कि आपको अगर अपनी भाषा की लड़ाई भी लड़नी है तो उनकी भाषा सीखकर लड़ो, ताकि उनका मुंहतोड़ जवाब दे सको.
यूपी-बिहार के लोगों के लिए मुंहतोड़ जवाब देने का वक्त आ चुका है. ताकि अब लोग उन्हें गंवारू भैया न समझें, बिहारी, पुरबिया कहें तो सम्मान के साथ. इसलिए इन दोनों अभियानों को बदलते वक्त के तकाजे के रूप में स्वीकार और अंगीकार करना चाहिए.
(Disclaimer: The views expressed in the blog are that of the author and was originally posted in The Sunday Indian)

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