खाली झुनझुन्ना से ना मानी भोजपुरिया लोग


भोजपुरी माटी के एगो खूबी बा. एकरा में सबसे कर्मठ आ बुद्धिजीवी पैदा भइले तऽ सबसे बड़ ठगो भइले. बिहार के सारण छपरा में देश के पहिला राष्ट्रपति आ ओह घड़ी के जानल मानल बुद्धिजीवी बाबू राजेन्द्र प्रसाद पैदा भइले तऽ ओहिजे नटवर लालो. बाकिर भोजपुरिया समाज नटवर लाल के आपन आदर्श ना माने. बाकिर इहो धेयान राखे के बा कि ई समाज ठगाये वाला ना हऽ. केहू भोजपुरियन के ठग ना सके. हालांकि ई कोशिश देश के सरकार आ नेता लोग कर रहल बा. बाकिर भोजपुरिया जागल बाड़े, ठगइहें ना. बात एकर सरकारी मान्यते के काहे ना होखे. दोसर भासा जइसन भोजपुरी के झुनझुना से ना बहलावल जा सकेला. भोजपुरी के विकास खाली एकरा के संविधान के अठवां अनुसूची में घुसा देला भर से ना होई. एकरा से तऽ खाली तीन गो फायदा बा. नोट पऽ भोजपुरी में लिखाये लागी, यूपीएससी के परीक्षा भोजपुरियो में दिया सकेला. आ भासा के मान्यता हो जाई. बस. भोजपुरी आ चाहे कवनो भासा के विकास खाती सरकार के कवनो धन आ समर्थन ना मिली. एहीसे मैथिली होखे आ चाहे कवनो अन्य क्षेत्रीय भासा. केन्द्र सरकार सबके मान्यता देके ठग देले बिया. छूंचे मान्यता से का होई हो?
विकास होता खाली अंग्रेजी के. मय सरकारी काम अंग्रेजी में होत बा. जनता के खून पसीना के गाढ़ कमाई से आवे वाला कुल्ह बजट बिना कहले अंग्रेजी पऽ खर्च होता. हिंदी के विकास तऽ सरकार नाम भर खाती करत बिया. ओकर विकास तऽ अपने आप देश के जनता करऽतिया. सरकार अगर लाग भिड़ के, बजट बना के सांचहूं कवनो भासा के गंभीरता से विकास करत बिया तऽ ऊ बा उर्दू. आ कारण बा राजनीतिक. हम एकरो से असहमत नइखीं. ओकर विकास होखे के चाहीं. बाकिर सवाल ई बा कि अइसहीं भारत के आउर भासा कुल्ह के विकास काहे ना होखे. काहे खाली उर्दू के अल्पसंख्यक भासा के दर्जा मिलल बा. धेयान राखीं कि धार्मिक अल्पसंख्यक आ भाषाई अल्पसंख्यक अलग अलग होले. ई हम नइखीं कहत, आपन देश के संविधान आ संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में साफ लिखल बा. तऽ भारत के भाषाई अल्पसंख्यक के धार्मिक अल्पसंख्यक से काहे जोड़ देहल गइल बा? का उर्दू भासा खाली मुसलमाने बोलेले, हिंदू लोग ना जाने? का भोजपुरी जाने आ बोले वालन में सिख ईसाई, मुसलमान आ जैन नइखन?
संसद में चिदंबरम के बयान, महापात्र कमेटी के रिपोर्ट आ पहिले तमाम केन्द्रीय मंत्री आ नेता लोगन के आश्वासन से एगो बात साफ बा कि अब मय लोग माने लागल बा कि भोजपुरी के भाषा से दर्जा मिल जाये का चाहीं. अगर भोजपुरी भासा बा तऽ बइठे के जगहो देवे के पड़ी नू. कहां बइठइब? बहुसंख्यक भासा में कि अल्पसंख्यक भासा में? भोजपुरी कवनो एगो प्रांत तक सिमटल नइखे. कवनो एगो प्रांत में बहुसंख्यक भासा के बनावे के हमनी के मांग नइखे. हमनी के दर्जा हिंदी के बादे बा रहे के चाहीं. तऽ जब हमनी के कतहूं बहुसंख्य नइखीं जा तऽ अल्पसंख्यके नू भइनीं जा. महापात्रा साहेब एकरा से सहमत बाड़े. अउर तमाम लोग सहमत बा. तऽ भोजपुरी के अल्पसंख्यक भासा के दर्जा काहे ना मिले के चाहीं. अगर मिल जाई ता एकरो विकास खाती सरकार के सैकड़ों करोड़ खर्चा करे के होई. आ एकरा से भोजपुरी के नौजवानन के रोजी रोजगार मिली. सरकार के इहे नू काम हऽ जी. कि जनता के भलाई करस. एही खाती नू हमनी के इनका लोग के चुन के भेजी लाजा.

कवनो भासा के अल्पसंख्यक भासा के दर्जा देवे खातिर कवन-कवन बुनियादी विशेषता होखे के चाहीं, भारतीय संविधान के प्रवधान आ यूएन के चार्टर के मोताबिक का होखे के चाहीं. भारत के सुप्रीम कोर्ट के एकरा बारे में का मत बा, एह कुल्ह मामला पऽ विचार कऽ के हम एह नतीजा पऽ पहुंचलीं कि भोजपुरी ओह कुल्ह शर्तन आ बुनियादी विशेषता के पूरा करतिया जेकरा तहत एकरा के अल्पसंख्यक भासा के दर्जा मिल सकेला… हम कुछ दिन पहिले जब इकरा बारे में केन्द्रीय गृह मंत्री पी चिंदंबरम से एगो प्रतिनिधिमंडल के साथे मिललीं, तऽ हम उनका के भोजपुरी भासा के एक हजार साल के इतिहास पऽ एगो बड़हन रिपोर्ट दीहनी आ साफ साफ कहनी कि भोजपुरी समेत भोरत के कुल्ह क्षेत्रीय भासा के अल्पसंख्यक भासा के दर्जा देके ओकर विकास करे खाती एगो राष्ट्रीय भारतीय भाषा आयोग बनावे के चाहीं. हमार एह मांग के समर्थन भारत सरकार के भाषा संबंधी समिति (महापात्रा कमेटी) के अध्यक्ष सीताकांत महापात्रो खुल के समर्थन कइले. आज देश में अंग्रेजी के विकास हो रहल बा. हिंदी के सरकारी तरीका से विकास होखत बा. आ उर्दू के विकास खातिर सरकार सैकड़ों करोड़ रूपया खर्च कर रहल बिया. ठीक बा होखे का चाहीं, बाकिर काहे ना अउर भासा के विकास होखे. राउर भासा के विकास होई तऽ रउआ रोजगार खाती दोसर भासा के सहारा ना लेवे के पड़ी. गांव घर के औरतन के बिंना अंग्रेजी पढ़ले रोजगार मिल सकेला. एहसे हम भोजपुरी समेत कुल्ह भारतीय भासा के विकास खाती एगो राष्ट्रीय भासा आयोग बनावे के सुझाव दे रहल बानीं

(The views expressed in the blog are that of the author Mr Onkareshwar Pandey, it was published in The Sunday Indians.)

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